अलिफ लैला – ( Part 1 ) अबुल हसन और हारूं रशीद की प्रेयसी शमसुन्निहर की कहानी

अलिफ लैला - ( Part 1 ) अबुल हसन और हारूं रशीद की प्रेयसी शमसुन्निहर की कहानी

बगदाद में खलीफा हारूं रशीद के राजकाल में एक अमीर और अच्छे संस्कारों वाला कारोबारी रहता था। वह दिखने में सुंदर होने के साथ-साथ मन से भी अच्छा व्यक्ति था। बगदाद के लोग उसका बड़ा मान-सम्मान करते थे। अन्य लोगों के साथ-साथ खलीफा के महल के लोग भी उसका बड़ा आदर करते थे। महल की सभी खास सेविकाएं उसी के यहां से कपड़ों और गहनों की खरीदारी किया करती थीं। वहीं, अबुल हसन नामक एक व्यक्ति उस व्यापारी का दोस्त था। अबुल हसन बका नामक एक अमीर व्यक्ति का बेटा था। बका फरस का अंतिम राजकुल था, इसलिए उसके बेटे अबुल हसन को लोग शहजादा कहते थे।

अबुल हसन दिखने में बहुत ही सुंदर युवक था। उसे गाने और कविताएं सुनाने का बड़ा अच्छा हुनर था। जब भी उसे वक्त मिलता, तो वह अपने व्यापारी दोस्त के दुकान में ही गाना-बजाना शुरू कर देता था और उसका गाना सुनने के लिए दुकान पर लोगों की भीड़ जमा हो जाती थी।

एक दिन जब शहजादा अबुल हसन अपने व्यापारी दोस्त की दुकान पर बैठा था। उसी वक्त एक स्त्री वहां अपनी सेविकाओं के साथ आई। उसने खूबसूरत कपड़े और जेवर पहने थे और वह दिखने में भी उतनी सुंदर थी। वह उस व्यापारी के यहां कुछ सामान खरीदने आई थी। व्यापारी उसे देखते ही उसके पास गया और सम्मान पूर्वक उसे दुकान के अंदर लेकर आया। व्यापारी ने उस स्त्री को एक खूबसूरत कमरे में बैठने को कहा। शहजादा अबुल हसन भी उस स्त्री के लिए एक छोटी चौकी लेकर आया, जिसपर उस युवती ने अपने पांव रखें।

यह सब देखकर वह स्त्री समझ गई थी कि यह जगह उसके लिए सुरक्षित है और इसलिए उस युवती ने अपने चेहरे का नकाब हटा दिया। जैसे ही उसने अपना नकाब हटाया, शहजादा अबुल हसन उसे बस देखता ही रह गया। वह बहुत ही सुंदर थी, वहीं वह स्त्री भी शहजादे को देखकर आकर्षित हो गई। पहली ही बार में उन दोनों को एक-दूसरे से प्यार हो गया। उस स्त्री ने शहजादे अबुल को वहां बैठने के लिए कहा। अबुल हसन ने उसकी बात मान ली और वहां उसके पास बैठ गया, लेकिन वह बिना पलकें झपकाएं सिर्फ उसे देखता ही जा रहा था।

शहजादे की ऐसी हालात देखकर वह समझ गई थी कि उसे भी उससे प्यार हो गया है। इसके बाद युवती व्यापारी के पास जाकर खरीदारी करने लगी और फिर बातों-बातों में व्यापारी से उस युवक का नाम-पता पूछने लगी। व्यापारी ने उस स्त्री के पूछे गए सवालों का जवाब देते हुए कहा कि ‘इस नौजवान का नाम अबुल हसन है। यह एक अमीर व्यक्ति बका का बेटा है। इसके दादा ईरान के अंतिम बादशाह थे। इसके खानदान की कई लड़कियों की शादी खलीफा के कुल में हुई है।’ व्यापारी की इन बातों को सुनकर और यह जानकर कि वह युवक राज घराने से है, वह बहुत खुश हुई। उसने व्यापारी से कहा, ‘मुझे यह अच्छे संस्कारों का युवक लगता है। आपकी मदद से मुझे इससे दोबारा मिलने की उम्मीद है। मैं अपनी एक खास सेविका को आपके पास भेजूंगी। उस वक्त आप इस युवक को अपने साथ मेरे यहां लेकर आना। अगर आप इसे लेकर आएंगे, तो मैं आपकी आभारी रहूंगी।’

यह सब सुनकर वह व्यापारी समझ गया कि वह भी शहजादे से प्रेम करने लगी है। उसने युवती को भरोसा दिलाया कि वह शहजादे को महल में लेकर आएगा। इसके बाद वह खूबसूरत स्त्री वहां से चली गई। वहीं, शहजादा उसे जाते देख देखता ही रह गया। शहजादे की ऐसी हालत देखकर व्यापारी ने उससे पूछा कि ‘भाई, क्या हो गया है तुम्हें? आस-पास के लोग तुम्हारी ऐसी हालत देखकर कई तरह की बातें बना सकते हैं।’

व्यापारी की बात सुनकर शहजादे ने कहा, ‘दोस्त, अगर तुम मेरे मन की हालत जानते, तो शायद ऐसा नहीं कहते। जब से मैंने उसको देखा है, मैं सिर्फ उसी के बारे में सोच रहा हूं। अब मेहरबानी करके तुम मुझे उसका नाम और पता बता दो।’ यह सुनकर व्यापारी ने कहा, ‘मेरे दोस्त, उसका नाम शमसुन्निहार है। वह खलीफा की सबसे प्रिय सेविका है।’

उस व्यापारी ने शहजादे को समझाने की कोशिश की। उसने कहा, ‘शमसुन्निहार को खलीफा बहुत मानते हैं। उन्होंने मुझे आदेश दिया हुआ है कि शमसुन्निहार को जिस भी वस्तु की आवश्यकता हो, मैं वह चीज उसे तुरंत दूं।’ शहजादे को सावधान करते हुए व्यापारी ने बताया कि अगर खलीफा को इस बारे में पता चला तो जान का भी खतरा हो सकता है। इतना सुनने के बाद भी अबुल हसन पर कुछ असर नहीं हुआ और वह शमसुन्निहार को याद करता रहा।

इन सबके बीच एक दिन व्यापारी के दुकान पर एक खास सेविका आई। उसने धीरे से उस व्यापारी से कहा कि ‘मालकिन आपसे और शहजादे अबुल से मिलना चाहती है, इसलिए उन्होंने आप दोनों को बुलाया है।’ यह सुनकर वे तुरंत सेविका के साथ जाने के लिए निकल गए। शमसुन्निहार खलीफा के बड़े राजमहल के एक कोने में मौजूद एक बड़े से कमरे में रहती थी। दासी दोनों को एक गुप्त दरवाजे से महल ले गई। महल में ले जाने के बाद उसने दोनों को एक खूबसूरत जगह पर बैठने को कहा और उनका खूब आदर-सत्कार किया और उन्हें कपड़ों पर लगाने के लिए सुंगधित इत्र भी दिए।

इसके बाद एक खास सेविका दोनों को एक सुंदर बैठक में ले गई। वह जगह बहुत ही सुंदर और आकर्षक थी। वहीं दूसरी तरफ के खंभों के बीच में एक दरवाजा लगा था, जिसके बाद खूबसूरत बरामदा और बगीचा था।

वे लोग महल की खूबसूरती का आनंद ले ही रहे थे कि कुछ सेविकाएं वहां आकर बैठ गईं और कई तरह के गाने-बजाने वाले यंत्रों को तैयार करने लगी। बगीचे में दोनों को ऐसे स्थान पर बैठाया गया था, जहां से वे सब कुछ देख सके। इसी बीच उन दोनों ने दूसरी ओर ऊंची चौकी देखी, जो महंगे रत्नों से जड़ी हुई थी। उसे देखकर व्यापारी ने धीरे से शहजादे को कहा, ‘शायद यह बड़ी चौकी शमसुन्निहार के बैठने के लिए है। खलीफा के सभी सेविकाओं में सिर्फ शमसुन्निहार को ही इजाजत है कि वह अपनी मर्जी से जहां चाहे वहां जा सकती है। इतना ही नहीं जब भी खलीफा को शमसुन्निहार से मिलना होता है, तो वह खुद पहले से अपने आने की जानकारी देते हैं।’

व्यापारी और शहजादा आपस में बात कर ही रहे थे कि तभी एक सेविका ने वहां आकर गाना-बजाना शुरू करने का आदेश दिया। शहजादा संगीत का आनंद ले ही रहा था कि तभी सेविकाओं ने शमसुन्निहार के आने का एलान किया। सबसे पहले शमसुन्निहार की खास सेविका आई और फिर दरवाजे पर रक्षक सेविकाएं हथियार लेकर शमसुन्निहार के स्वागत में खड़ी हो गई।

कुछ ही देर में शमसुन्निहार आती है और अपनी चौकी पर बैठ जाती है। उसने सिर से पांव तक हीरे-मोतियों से जड़े गहने पहने थे। बैठने के बाद उसने सेविकाओं को आदेश दिया कि वे अपनी कला का प्रदर्शन करें।

शमसुन्निहार के कहने पर उन लोगों ने गीत गाना शुरू किया। उनके गीत शहजादे और शमसुन्निहार की हालत को बखूबी व्यक्त कर रहे थे। जिसके बाद शहजादे ने भी बांसुरी ले ली और बहुत देर तक उसे बजाता रहा। जब उसने बांसुरी बजाना बंद किया, तो शमसुन्निहार ने वही बांसुरी ली और दिल पर असर करने वाली एक धुन निकाली। फिर शहजादे ने एक वाद्य यंत्र लिया और एक मन को लुभाने वाला संगीत बजाने लगा। अब माहौल कुछ ऐसा हो गया कि शहजादा और शमसुन्निहार एक-दूसरे से अलग नहीं रह पा रहे थे। थोड़ी देर बाद दोनों ने एक-दूसरे को गले लगा लिया, लेकिन खुशी से अचानक दोनों बेहोश हो गए।

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